उपन्यास समीक्षा - उसे पारिजात बनना था: एक अनाम आत्मीयता की कहानी- लेखिका -श्रुति कात्यायनी
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उसे पारिजात बनना था: एक अनाम आत्मीयता की कहानी
• किताब का नाम: उसे पारिजात बनना था
• लेखिका: श्रुति कात्यायनी
• प्रकाशक: DPS Publishing House
• मूल्य: ₹295/-
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कुछ उपन्यास अपनी कहानी के कारण याद रहते हैं और कुछ अपने भीतर उपस्थित उन संबंधों के कारण, जिन्हें कोई निश्चित नाम देना संभव नहीं होता। ‘उसे पारिजात बनना था' इसी दूसरी श्रेणी का उपन्यास है। यह मूलतः एक ऐसे बुद्धिमान, संवेदनशील लेकिन कुछ हद तक आत्मकेंद्रित युवक और उसके जीवन में लगातार उपस्थित रहने वाली एक युवती की कहानी है, जिनके संबंध को लेखक ने प्रेम या मित्रता जैसे सुविधाजनक शब्दों में बाँधने से परहेज किया है।
कहानी की शुरुआत ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक लड़की से होती है। पिता का तबादला होने के कारण उसे नया शहर और नया स्कूल मिलता है। इसी स्कूल में उसकी मुलाकात आकाश से होती है। आकाश विद्यालय का लोकप्रिय, मेधावी और प्रभावशाली विद्यार्थी है। उसके आसपास विद्यार्थियों की भीड़ लगी रहती है। वह दूसरों की पढ़ाई में सहायता करके प्रसन्न होता है। उसकी लोकप्रियता और व्यक्तित्व से लड़की प्रभावित होती है, लेकिन उसके प्रति आकाश का रूखापन उसे और अधिक आकर्षित करता है। किशोर मन का यह विचित्र मनोविज्ञान कहानी के आरंभिक हिस्से को स्वाभाविकता देता है।
दोनों के बीच धीरे-धीरे एक ऐसा संबंध विकसित होता है जिसे न तो पूरी तरह मित्रता कहा जा सकता है और न प्रेम। वे एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं, एक-दूसरे की उपस्थिति का आनंद लेते हैं, लेकिन संबंध को कोई नाम नहीं देते।
इसी क्रम में एक प्रसंग आता है, वह आहत होकर उससे दूर हो जाती है। बाद में यह गलतफहमी दूर होती है। यह प्रसंग महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं उपन्यास पाठक को यह संकेत देता है कि दोनों के बीच जो कुछ है, उसे देह या रोमांटिक आकर्षण के सामान्य ढाँचे में रखकर नहीं समझा जा सकता।
समय आगे बढ़ता है। आकाश का विवाह प्राची से होता है। प्राची आकाश की प्रतिभा और उसके भीतर के ‘जीनियस’ को वह महत्व नहीं देती, जिसकी वह अपेक्षा करता है। परिणामतः दोनों के वैवाहिक जीवन में तनाव और झगड़े बने रहते हैं। उनका एक बेटा भी होता है। दूसरी ओर आकाश को सरकारी नौकरी मिल जाती है। लेकिन नौकरी, विवाह, पत्नी और बच्चे, इन तमाम सामाजिक भूमिकाओं के बीच भी उसका भीतर का बेचैन व्यक्ति शांत नहीं होता।
अंततः वह सरकारी नौकरी छोड़कर आश्रम चला जाता है।
यहीं आकाश का चरित्र सबसे अधिक जटिल हो जाता है।
वह शांति की तलाश में संसार से दूर चला जाता है, लेकिन क्या यह वास्तव में आध्यात्मिक खोज है या अपनी जिम्मेदारियों से पलायन? उपन्यास इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं देता। मेरे लिए आकाश का यह निर्णय उसे एक 'आंशिक रूप से escapist चरित्र' बनाता है। वह अपने भीतर की बेचैनी को समझने की कोशिश तो करता है, लेकिन अपने आसपास के लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप स्वयं को बदलने की लचीलापन उसमें दिखाई नहीं देता।
वह अपने चाचा का एहसान चुकाने के लिए उनकी पसंद की लड़की से विवाह कर लेता है, लेकिन विवाह के बाद पत्नी और बच्चे के साथ जीवन को संतुलित करने के लिए जिस भावनात्मक लचीलेपन की आवश्यकता थी, वह उसमें नहीं दिखाई देता। वह अपने भीतर के ‘सत्य’ के प्रति जितना ईमानदार है, उतना ही अपने पारिवारिक दायित्वों के प्रति असहज।
इसी बिंदु पर उपन्यास आकाश को केवल ‘जीनियस’ युवक न रहने देकर एक मानवीय विरोधाभास में बदल देता है।
## आकांक्षा : प्रेमिका नहीं, लेकिन उससे कहीं अधिक
आकाश की कहानी में आकांक्षा की भूमिका और भी दिलचस्प है। उसकी शादी हो चुकी है और वह अपने पारिवारिक जीवन में खुश है। वह आकाश के प्रति कोई रोमांटिक दावा नहीं करती। वह उसे अपना प्रेमी नहीं मानती। वह यह भी नहीं कहती कि दोनों के बीच कोई पुरानी प्रेमकथा अधूरी रह गई है।
फिर भी जब उसे पता चलता है कि आकाश सरकारी नौकरी छोड़कर आश्रम में चला गया है, तो वह उसे वहाँ से वापस लाती है। अपने साझा मित्र के स्कूल में उसके लिए विज्ञान शिक्षक की नौकरी की व्यवस्था करती है और स्वयं भी उसी स्कूल में काम करने लगती है।
यहाँ उसका चरित्र एक असाधारण रूप लेता है।
वह आकाश को पाना नहीं चाहती, लेकिन उसे खोना भी नहीं चाहती।
वह उसके साथ जीवन नहीं बिताना चाहती, लेकिन उसके जीवन को बिखरने भी नहीं देना चाहती।
वह उससे प्रेम का दावा नहीं करती, लेकिन उसके जीवन की चिंता उस व्यक्ति से अधिक करती है जो स्वयं आकाश के जीवन से जुड़े हैं।
शायद यही इस उपन्यास का सबसे खूबसूरत और सबसे कठिन प्रश्न है—**क्या किसी व्यक्ति के प्रति गहरी आत्मीयता के लिए प्रेम का नाम आवश्यक है?**
## पारिजात का प्रसंग
उपन्यास का सबसे सुंदर प्रतीक अंत में आता है।
स्कूल में आकाश अब एक लोकप्रिय शिक्षक बन चुका है। विद्यार्थी उसे उसी तरह घेरकर खड़े हैं, जैसे कभी स्कूल के दिनों में विद्यार्थी उसकी मदद लेने के लिए उसके आसपास रहते थे। वह अपने शिक्षक और मेंटर होने में आनंद अनुभव करता है।
तभी वह आकांक्षा को देखता है और उसे पारिजात के फूल देता है, वही फूल जो वह हमेशा अपनी माँ को दिया करता था।
और फिर उसका कहना कि 'पुरानी चीजों को दोहराने में क्या खराबी है, अगर वे खुशी देती हों', पूरे उपन्यास के भाव-संसार को एक छोटे-से वाक्य में समेट देता है।
पारिजात यहाँ केवल फूल नहीं है। वह स्मृति है, निरंतरता है, बचपन और वर्तमान के बीच पुल है और शायद उस संबंध का भी प्रतीक है जिसे समय बदलता रहा, लेकिन समाप्त नहीं कर सका।
आकाश किशोरावस्था में भी दूसरों की मदद करके खुश होता था। अब शिक्षक बनकर भी वही काम कर रहा है। नौकरी, विवाह, आश्रम और जीवन की तमाम असफलताओं से गुजरने के बाद वह अंततः उसी जगह लौटता है जहाँ उसका वास्तविक सुख था—दूसरों के जीवन में उपयोगी होना।'
इस अर्थ में ‘पारिजात’ आकाश के चरित्र का भी रूपक बन जाता है—ऐसा व्यक्ति जो स्वयं के लिए कम और दूसरों के लिए अधिक अर्थवान है, लेकिन अपने जीवन की व्यावहारिक जिम्मेदारियों से लगातार उलझता रहता है।
## प्रेम है या नहीं?
उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी यह है कि लेखक पाठक को यह तय करने के लिए मजबूर करता है कि दोनों के बीच आखिर है क्या।
इसे प्रेम कहें तो दोनों के बीच प्रेमियों जैसी आकांक्षा नहीं है।
इसे मित्रता कहें तो मित्रता से कहीं अधिक गहरी भावनात्मक चिंता है।
इसे आकर्षण कहें तो आकर्षण से कहीं अधिक दीर्घजीवी आत्मीयता है।
इसे प्रेम-विवाह की असफल कहानी कहें तो दोनों के जीवन अलग-अलग हैं और लड़की अपने वैवाहिक जीवन में संतुष्ट है।
इसलिए मुझे यह संबंध ‘अनाम आत्मीयता’ का संबंध लगता है।
यह वह रिश्ता है जिसमें व्यक्ति दूसरे को पाना नहीं चाहता, लेकिन उसके सुख और अस्तित्व की चिंता करता है। इसमें अधिकार कम है और अपनापन अधिक। इसमें साथ रहने की इच्छा नहीं, लेकिन एक-दूसरे के जीवन को बेहतर देखने की आकांक्षा है।
इसे ‘निःस्वार्थ भावनात्मक सहचर्य’ भी कहा जा सकता है।
## हिंदी उपन्यासों की परंपरा में यह संबंध
हिंदी उपन्यास में स्त्री-पुरुष संबंधों की ऐसी जटिलताएँ नई नहीं हैं। ‘गुनाहों का देवता’ में चंदर और सुधा का संबंध प्रेम, सामाजिक मर्यादा, त्याग और आत्मसंयम के बीच उलझा रहता है। वहाँ प्रेम को सामाजिक संरचना लगातार नियंत्रित करती है।
वहीं ‘कसप’ में मनोहर श्याम जोशी स्त्री-पुरुष संबंधों को अधिक आधुनिक, विडंबनापूर्ण और अस्थिर धरातल पर देखते हैं। वहाँ भी संबंधों को किसी एक नैतिक या रोमांटिक सूत्र में बाँधना आसान नहीं है।
इसी तरह निर्मल वर्मा की रचनाओं में कई बार संबंधों की वास्तविकता उनके नाम से अधिक महत्वपूर्ण होती है। पात्र एक-दूसरे के निकट होते हुए भी पूरी तरह एक-दूसरे के नहीं हो पाते। उनके बीच जो बचा रहता है, वह अक्सर स्मृति, अकेलापन और आत्मीयता का क्षेत्र होता है।
उसे पारिजात बनना था की विशिष्टता यह है कि यहाँ स्त्री-पुरुष संबंध को विवाह या प्रेम की परिणति तक पहुँचाने के बजाय लेखक उसे एक दीर्घकालिक मानवीय उपस्थिति के रूप में देखता है।
## आकांक्षा का चरित्र भी उतना ही जटिल
नायिकाा चरित्र पूरी तरह सरल नहीं है। वह बुद्धिमान है, तार्किक है और कई बार अपने बौद्धिक व्यक्तित्व को प्रदर्शित करने के लिए शब्दों की बाजीगरी करती दिखाई देती है। कभी-कभी उसका अतितार्किक होना स्वाभाविक संवाद के बजाय लेखक की वैचारिक स्थापना जैसा लगता है।
लेकिन यही उसकी जटिलता भी है।
वह आकाश से प्रेम नहीं करती, फिर भी उसकी चिंता करती है।
वह उसे अपना नहीं मानती, फिर भी उसके जीवन को पटरी पर लाने के लिए सक्रिय होती है।
वह उसके साथ जीवन नहीं बिताती, लेकिन उसके जीवन को अर्थपूर्ण बनाने में सहायता करती है।
इसलिए वह आकाश की नही से उसकी **well-wisher** है—और शायद उससे भी आगे जाकर उसकी ऐसी आत्मीय उपस्थिति है, जो उसके जीवन के उन हिस्सों को पहचानती है जिन्हें स्वयं आकाश भी हमेशा नहीं पहचान पाता।
## आकाश : जीनियस होने की कीमत
आकाश का चरित्र इस उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक पक्ष है। वह बुद्धिमान है, लोकप्रिय है, दूसरों की मदद करता है और ज्ञान बाँटकर आनंद प्राप्त करता है। लेकिन अपने निजी जीवन में वह उतना सफल नहीं है।
यही विरोधाभास उसे रोचक बनाता है।
जो व्यक्ति दूसरों को जीवन की दिशा बता सकता है, वह अपने जीवन की दिशा को लेकर स्वयं असमंजस में है।
जो विद्यार्थियों को पढ़ने में मदद कर सकता है, वह अपने विवाह को समझने में असफल है।
जो शिक्षक के रूप में उत्कृष्ट है, वह पति और पिता के रूप में असहज है।
इसलिए आकाश की असली त्रासदी उसकी प्रतिभा नहीं, बल्कि प्रतिभा और जीवन-व्यवहार के बीच का अंतर है।
## उपन्यास की केंद्रीय संवेदना
मेरी दृष्टि में यह उपन्यास प्रेम की कहानी कम और मनुष्य के अपने स्वभाव की ओर लौटने की कहानी अधिक है।
आकाश सरकारी नौकरी छोड़ता है, आश्रम जाता है और अंततः शिक्षक बनकर लौटता है। शायद उसे अंततः यह समझ में आता है कि शांति संसार से भागने में नहीं, बल्कि अपने स्वभाव के अनुकूल जीवन जीने में है।
विद्यालय उसके लिए केवल नौकरी नहीं है। यह उसका स्वाभाविक संसार है।
वह वहीं लौटता है जहाँ कभी विद्यार्थी उसके आसपास रहते थे और अब शिक्षक के रूप में विद्यार्थी उसके आसपास हैं।
इस अर्थ में उपन्यास का अंत किसी प्रेम की परिणति नहीं, बल्कि आत्म-पहचान की परिणति है।
और पारिजात का फूल इस पूरी यात्रा का सबसे सुंदर प्रतीक बन जाता है।
## निष्कर्ष
‘उसे पारिजात बनना था केवल कथा की तरह पढ़ा जाए तो शायद कुछ प्रश्न अनुत्तरित रह जाएँगे। लेकिन यदि इसे दो व्यक्तियों के बीच विकसित हुई एक अनाम आत्मीयता की कहानी की तरह पढ़ा जाए, तो इसके कई अर्थ खुलते हैं।
यह ऐसे दो लोगों की कहानी है जो एक-दूसरे को पाना नहीं चाहते, लेकिन एक-दूसरे के जीवन से पूरी तरह अनुपस्थित भी नहीं हो सकते।
यह प्रेम नही परवाह की कहानी है।
यह मित्रता से अधिक आत्मीयता की कहानी है।
यह साथ रहने से अधिक साथ होने की कहानी है।
और शायद यही इस उपन्यास का सबसे सुंदर प्रश्न है, हर गहरे रिश्ते को कोई नाम देना क्या जरूरी है?
कुछ रिश्ते प्रेम नहीं होते, मित्रता भी नहीं होते। वे बस किसी पुराने पारिजात की तरह होते हैं, रात में चुपचाप खिलते हैं, सुबह किसी के हाथ में आ जाते हैं और बिना कुछ माँगे यह याद दिलाते हैं कि कुछ चीजें इसलिए दोहराई जाती हैं क्योंकि वे हमें खुश करती हैं।
मेरे लिए आकाश और आकांक्षा का रिश्ता ‘अनाम आत्मीयता’ है; एक ऐसा संबंध जिसमें अधिकार नहीं, परवाह है; अपेक्षा नहीं, शुभेच्छा है; साथ नहीं, लेकिन एक-दूसरे के जीवन में एक स्थायी उपस्थिति है।
और शायद इसी अर्थ में, उसे पारिजात बनना था.
हर इंसान के भीतर एक ना एक कहानी छुपी होती है...
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