Monday, 7 September 2020

कोल्हानम (KOLHANAM) -छोटानागपुर पठार के सनातन संपर्कों को तलाशती ईसा-पूर्व 100 की महागाथा !! (ISBN: 978-93-5416-405-7) बुक रिव्यु

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उपन्यास समीक्षा /पाठकों की प्रतिक्रिया

कोल्हानम 

ISBN 
      (उपन्यास )

छोटानागपुर पठार के सनातन संपर्कों को तलाशती ईसा-पूर्व 100 की महागाथा !!

 ISBN 978-93-5416-405-7

by Mithilesh Kr Choubey

Title: कोल्हानम (उपन्यास, Fiction)
लेखक: डॉ० मिथिलेश कुमार चौबे
कॉपीराइट: लेखक (सर्वाधिकार सुरक्षित)
संस्करण: प्रथम
प्रकाशन का वर्ष:2020
पुस्तक वर्जन: पेपर बैक (पृष्ठ संख्या:196)
मूल्य: 150 रूपये
ISBN: 978-93-5416-405-7




 अत्यधिक रोचक और  ज्ञानवर्धक  उपन्यास है.कोल्हानम!!

 श्री मिथलेश चौबे जी के द्वारा लिखित कोल्हानं में सनातन संस्कृति के उत्थान के पूरे इतिहास को उद्धरित किया गया है।धर्मान्तरण के विषैले प्रकोप से बचाने के लिए भी महत्वपूर्ण है। 

 मैंने अपनी पत्नी से भी कहा कि वह इस  उपन्यास को जरुर पढ़े.

  @श्री सुबोध श्रीवास्तव, पूर्व-उपाध्यक्ष, टाटा वर्कर्स यूनियन.झारखण्ड प्रदेश.



Vikas Srivastava सर्व प्रथम मिथिलेश सर आपको एक और नयी पुस्तक (उपन्यास) लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई. आपने मुझे आपने अपने इस उपन्यास के छपने के पूर्व समीक्षा करने के काबिल समझा, इसके लिए आपका आभार.

 कोल्हानम उन उपन्यासों से बहुत अलग है जिसमें केवल रहस्मयी कहानियां होती है. यह कई तथ्यों के साथ उन सच्चाई को उजागर करने वाला उपन्यास साबित होगा जिसके बारे में लोग दबी जुबान से चर्चा को करते हैं, लेकिन विरोध नहीं कर पाते हैं. विश्वविद्यालय में पीएचडी के नाम किस तरह से परिवार वाद होता है. आम विद्यार्थियों को परेशान किया जाता है इसको आपने जिस तरह से कहानी के रूप में प्रस्तुत किया है वह इसकी रोचकता और महत्व को बढ़ा रही है. यह अपने उपन्यास में एक स्कैम के खुलासा के तौर पर भी पढ़ा जायेगा. विश्वविद्यालय में रिसर्च (पीएचडी) करने आयी छात्रा की कहानी से आपने जिस तरीके से झारखंड के आदिवासियों की संस्कृति उनका हिंदू रीतियों से जुड़ा होने का सबूत देना, वैसे लोगों के गाल पर तमाचा है जो यहां के आदिवासियों को अक्सर गाहे बगाहे अलग लाइन में खड़ा कर देते हैं और उन्हें भड़काने का काम करते हैं. कोल्हानम के माध्यम से आपने झारखंड की संस्कृति को भी चित्रित करने काम किया है. इसे पढ़ने से कई लोगों की जानकारी का स्तर बढ़ेगा. यह उपन्यास उनके लिए काफी उपयोग साबित होगा, जो झारखंडी संस्कृति सभ्यता को समझना चाहते हैं. पुस्तक में आपने बौद्ध धर्म का जिक्र और झारखंड ही नहीं भारत से उसके जिस तरीके से संबंध को सामने रखा है यह मुझ जैसे लोगों के बिल्कुल नयी जानकारी है. उपन्यास का हर पहलू पाठक को आगे पढ़ने पर मजबूर करेगा. कहानियों का जुड़ाव उसके तारतम्य को बनाने में काफी कारगर साबित दिख रहा है. मेरे से पूर्व समीक्षक ने आपको इसमें कुछ सुझाव जरूर दिये होंगे. लेकिन मैं यह सुझाव आपको व्यक्तिगत तौर पर दूंगा. चुकी किताब प्रकाशित होने वाली है. इसलिए इस संबंध में फेसबुक पर लिखना उचित नहीं समझा. एक बार फिर से आपको फिर से इस अवसर के लिए आभार और धन्यवाद. कोल्हानम की सफलता की पूर्व से आपको बधाई.


कोल्हानम , भारतीयों को एकता और उनमें आपसी.संबंध, समाज को तोड़ने वाली ताकतें, उनका षडयंत्र, इतिहासों और धर्मग्रंथों की अलग एवं गलत व्याख्या करने वाले लोग, विश्वविद्यालयों में बुद्धिजीवी के नाम पर बैठे मानवता के दुश्मन, तथा भारतीज इतिहास की एक नयी व्याख्या के रूप में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराने में सफल है डा. मिथिलेश के द्वारा लिखी गयी पुस्तक " कोल्हानम्"।

इस उपन्यास की शैली और संरचना दोनों जीवंत है। इसमें तथ्यात्मक पहलुओं को पिरोया गया है। कहीं-कहीं कल्पनाओं का सहारा भी पाठक को रोचकता प्रदान करने के लिए लेखक ने लिया है। कुछ उक्तियाँ, कुछ हास्य परिहास की बातें इस उपन्यास को सजीव बनाने में सहायक बन पड़े हैं। समसामयिक घटनाओं को आधुनिक परिपेक्ष में दिखाने का प्रयास किया गया है। चरित्र चित्रण भी कथा के अनुरूप हीं किए गए हैं।

बहरहाल लम्बी समीक्षा की ओर न जाते हुए इतना कह सकता हूं कि डा. मिथिलेश की यह पुस्तक धर्मांध लोगों की कुत्सित मानसिकता और उसके आड़ में कई समाज विरोधी संस्थाओं की और भी इशारा करती है। जो यह नहीं चाहते की लोग एक रहें।

आशा है यह पुस्तक बहुत सारे लोगों के भ्रम को दूर करने का कर्य करेगी जो एक थोपी हुई मानसिकता के अंध समर्थक होकर मूल चीजों को नकारने का कार्य करते हैं।

अगर एक वाक्य में कहूँ तो डा. मिथिलेश की यह पुस्तक " सत्य सनातन को स्थापित करने वाली साबित होगी" ।

मैं उनके इस पुस्तक की सफलता और पाठकों पर सकारात्मक प्रभाव डालने के लिए बधाई और शुभकामनाएं देता हूँ।

राकेश कुमार पाण्डेय
सहायक प्राध्यापक/रंगकर्मी
ग्रेजुएट कॉलेज, जमशेदपुर।


कोल्हानम, झारखण्ड में रहने वाली जनजातियों  की सांस्कृतिक जड़ों को तलशता  एक बेहद अद्भुत उपन्यास है.  इस उपन्यास को मै   आप सभी को  इस  पुस्तक की पढने की सलाह दूंगा, खर कर उन्हें   जो, जनजातीय समाज को  भारत की मूल सांस्क्रतिक धारा से अलग मानते है. 

 बेहतरीन प्रस्तुति, रहस्यमयी  और ज्ञानवर्धक!!!

 @  प्रो० कमलेश कुमार कमलेन्दु 





कोल्हानम, छोटानागपुर की धरती से निकली एक बेहतरीन कृति है. हर पाठक अपनी मूल विचारधारा की कसौटी के परिपेक्ष में किसी रचना की आलोचनात्मक  समीक्षा करता है.कई बार, पूर्वाग्रह हमारे पढने की लय को तोड़ देता है.और हम किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की कोशिश करने लगते हैं. तो कोल्हानम की खूबसूरती यह है कि अगर आप इसकी पहली लाइन पढ़ लें,  तो आप इसकी अंतिम पंक्ति तक कब पहुँच जायेंगे आपको पता भी नहीं चलेगा. कुछ समय तक विचारधारा से आपका पीछा छुट जायेगा और आप उपन्यास की बेहतरीन विधा के आनंद में आप खो जायेंगे. उपन्यास में रूचि न रखने वाले पाठक भी कुछ नया अनुभव करेंगे.   अद्भुत और अतुलनीय !
@ शैलेश, पटना.(शैलेश, पीएचडी  रिसर्च स्कॉलर हैं)

किताब एक बैठक में ख़त्म ! लगता है, इसे लिखते समय मिथिलेश जी की कलम पर कोई प्रेत बैठ गया था. कथावस्तु बेहद दिलचस्प है, लेकिन, वैचारिक रूप से कंटेंट पर मेरी असहमति है.  मिथिलेश की पिछली किताब 'सन अस्सी' ज्यादा यथार्थवादी थी.@प्रो०  विजय कुमार 'पियूष'., सहायक प्राध्यापक, जमशेदपुर कोआपरेटिव कॉलेज में हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे हैं.




कोल्हानम- जादुई यथार्थवाद या कुछ और ???

जब आप इस उपन्यास को आरम्भ करते हैं तो लगता है जैसे आप आदरणीय राहुल सांकृत्यायन जी की ‘निराले हीरे’ की खोज’ फिर से पढने वाले हैं.
लेकिन, अगले ही पल ये कहानी रणेन्द्र के उपन्यास 'ग्लोबल गाँव के देवता' से प्रभावित जान पड़ती है, परन्तु आप एक बार फिर से धोखा खा रहे हैं. मिथिलेश जी की ‘सन अस्सी’ जैसे ‘कासी का अस्सी’ नहीं थी, वैसे ही ‘कोल्हानम’, 'ग्लोबल गाँव के देवता' या ‘निराले हीरे की खोज’ नहीं है.

कोल्हानम, भारत के प्राचीन इतिहास की कई स्थापित मान्यताओं को चुनौती नहीं देती, बल्कि उलट देती है.

मिथिलेश के पिछले उपन्यास “सन अस्सी’ में आपको सबकुछ जाना-पहचाना लगता है, लेकिन ,‘कोल्हानम’ की कथावस्तु विल्कुल रहस्यमयी और अनजानी है जो एक अलग ही ट्रैक पर चलती हैं.

कोल्हानम कहानी ईसा पूर्व 200 की जरुर है, किन्तु, यह किताब सन 2020 में भी विश्वविद्यालयों कुछ स्वनामधन्य विद्वानों और वहाँ रिसर्च संस्कृति पर गहरी चोट करेगी.

आप इस किताब से बेहद नफरत करेंगे, या बेहद मोहब्बत. लेकिन, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आपको धर्म की राजनीतिकरण की वर्तमान प्रक्रिया की कितनी जानकारी है, या है भी नहीं!-

मिथिलेश सर की एक फोटो शेयर कर रहा हूँ.  इस किताब का इन्तजार कर रहा रहा हूँ. एक अनुरोध-कवर पेज बदल दीजिये.
@ डॉ अमर राजवंशी, मालदा. प० बंगाल


अद्भुत लगा पढ़कर. हम भी इतिहास के स्टूडेंट रहे हैं पर इतनी जानकारी नहीं थी. बहुत ही अच्छा लगा पढकर. बहुत बहुत शुभकामना !  @ बालेन्दु शेखर पाठक, जमशेदपुर , झारखण्ड.



मिथिलेश जी की शैली बेहद सहज और सरल है.  वे मुद्दे की बात करते हैं  बेहद  अलौकिक शैली में . उनमे पाठकों के साथ संवाद स्थापित करने की अद्भुत क्षमता है. कोल्हानम, बेहद अद्भुत और प्रयोगधर्मिता से भरपूर है. 

@राकेश कुमार नंदा (युवा उपन्यासकार)

कोल्हानम( Kolhanam)-(ISBN 978-93-5416-405-7)छोटानागपुर पठार में सनातन संस्कृति के संपर्कों को तलाशती, ईसा-पूर्व 100 से 200 ईसवी की कहानी

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(इतिहासकार डॉ० एच० सी० राय1915) और भारतीय पुरातात्विक विभाग के खोजों की पृष्ठभूमि में छोटानागपुर पठार में सनातन संस्कृति के संपर्कों को तलाशती, ईसा-पूर्व 100 से 200 ईसवी की कहानी!

‘मुंडा’ और ‘असुर’ जनजातियों  के इतिहास, माइथोलॉजी और सनातन सम्पर्कों तलाशता यह उपन्यास छोटानागपुर, गुमला और कैमूर के पठारी और पहाड़ी इलाकों में ईसा-पूर्व में घटी घटनाओं का जादुई और रहस्यमयी इंद्रजाल बुनता है.  



Monday, 20 July 2020

Social and psychological impact of COVID-19 pandemic-Are we moving towards a permanent social and emotional disintegration?

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 Social and psychological impact of COVID-19 pandemic
Are we moving  towards a permanent social and emotional disintegration?
Dr. Mithilesh Kumar Choubey
Editor, Jamshedpur Research Review(ISSN-2320-2750)
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The Indian society, which built a deep social- emotional bond through the process of 'meeting and feeding', 'eating and feeding', 'giving and taking', is a clear indication of the rift in that great system.
Today India is unsuccessfully trying to find the same warmth in virtual video conferencing. But in the virtual world, the cracks in deep emotional bonds are clearly visible. Physical distancing is powerful enough to create cracks in your social bond alone.

This epidemic has damaged the roots of our glorious, traditional collectivness  and sociability. Its marks are long-term or permanent living. World famous Indian marriages are taking place in a closed room in front of closest  relatives. Birthday celebrations have  been confined to social media. People are unable to attend the funeral of their closest relatives. We are not able to give due respect to the departed souls. There is an inability to complete the remaining rituals after death.
In future, we will meet or congratulate on the phone. Are we going towards a permanent social disturbance? Governments can meet food, health and other basic needs, but how will our social and emotional needs be met?

Covid -19 pandemic has shown us that defense is the best option, and nature is omnipotent. Violation of the laws of nature in the guise of materialism is extremely dangerous.


Monday, 22 June 2020

कोरोना महामारी का भारतीय प्रिंट न्यूज़ मीडिया पर प्रभाव

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कोरोना महामारी का  भारतीय प्रिंट न्यूज़ मीडिया पर प्रभाव
डॉ० मिथिलेश कुमार चौबे
editorjrr@gmail.com 

भारत में करोड़ो लोगों के लिए  अखबार पढ़ना  रोजमर्रा की जिन्दगी का एक  महत्वपूर्ण हिस्सा  है. दरअसल कई लोगों के लिए  ताजे  अकबार के पन्ने में रची-बसी प्रिंटिग की तेजाबी गंध दिन की शुरुआत कराती है. भारत में अखबार के शौकीनों की संख्या करीब 20करोड़ होगी.  इसमें, दुकानों, सलूनों तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर मांग कर अखबार पढने वालों की संख्या शामिल नहीं है.
लेकिन कुछ सालो से अख़बारों की दुनिया में पतझड़ का मौसम का आया हुआ है. टीवी के बाद इन्टरनेट ने अख़बारों को गंभीर चुनौती दी है. लेकिन इन माध्यमों के बीच भी अखबार अपनी विस्वसनीयता की  ताल ठोकते रहे हैं.  अखबार आज भी खबरों की विश्वसनीयता और क्रॉस रिफरेन्स के लिए सबसे अधिक विश्वसनीय माध्यम है.
लेंकिन कोरना  वायरस के संकट के दौरान अख़बारों के माध्यम से वायरस फैलने की अफवाह ने अखबार के व्यवसाय पर गहरी चोट दी है. इससे पहले इस महामारी के दौरान अभूतपूर्व आर्थिक गतिरोध की वजह से लगी है.                                       
इन दो आधातों ने पूरेप्रिंट मध्यम को घुटने पर ला खड़ा किया है. दरअसल पूरा का पूरा प्रिंट मीडिया पिछले दो सालों से आर्थिक मंदी का शिकार है. पिछले साल मीडिया बैरन सुभाष चंद्रा द्वारा संचालित अंग्रेजी दैनिक डीएनए ने पिछले साल अपनी कंपनी एस्सेल ग्रुप के वित्तीय संकट में पड़ने के बाद छपाई बंद कर दी थी। केरल और बेंगलुरु के लिए डेक्कन क्रॉनिकल संस्करण, और मुंबई और कोलकाता में एशियाई युग के संस्करणों को भी पिछले साल अचानक बंद कर दिया गया था। झारखण्ड  से टेलीग्राफ का प्रकाशन बंद कर दिया गया है

अखबारों और पत्रिकाओं के प्रचलन में विज्ञापनों का बहुत बड़ा योगदान होता है. आर्थिक गतिविधियों के कमजोर  पड़ने के कारण विज्ञापनों की सख्या में लगातार कमी आ रही है.           अब मीडिया घरानों ने अपने लागत  में कमी लाने के लिए पेजों की संख्या में कमी करने, प्रिंटिंग को ले-ऑफ करने, कर्मचारियों के वेतन में कटौती और कर्मचारियों की छटनी  का काम शुरू कर दिया है इस संकट ने आनंद बाजार पत्रिका ग्रुप, द टाइम्स ग्रुप, इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप, हिंदुस्तान टाइम्स मीडिया लिमिटेड, बिजनेस स्टैंडर्ड लिमिटेड और क्विंटिलियन मीडिया प्राइवेट लिमिटेड  जैसे शीर्ष खिलाड़ियों तथा प्रभात खबर, रांची एक्सप्रेस, जैसे क्षेत्रीय अख़बारों को भी प्रवावित किया है
टाइम्स ऑफ इंडिया, द इकोनॉमिक टाइम्स और नवभारत टाइम्स नें कर्मचारियों के वेतन में १ अप्रैल से ५-१० प्रतिशत तक कटौती करने का निर्णय लिया हैं. ख़बरों के अनुसार टीवी समाचार चैनल एनडीटीवी ने भी 1 अप्रैल से 10 से 40 प्रतिशत के बीच वेतन कटौती की घोषणा की। यह  कटौती 50,000 रुपये से अधिक आय वाले कर्मचारियों के लिए वेतन कटौती लागू है. तथा यह तीन महीने के लिए है.


आउटलुक पत्रिका का प्रकाशन तत्काल प्रभाव से रोक दिया गया है. बिजनेश वेबसाइट BQ ने भी अपना टेलीविजन डिवीजन बंद कर दिया है.  द क्विंट ने अपने ४५ कर्मचारियों को फरलो यानि बिना वेतन के अनिश्चित कालीन अवकाश पर भेज दिया है.
दरअसल, भारत का  खबरिया उद्योग पूरी तरह से सरकारी और गैर-सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर है. लेकिन अब  एक ऐसे माडल की जरुरत है जिसमें उपयोगकर्ता भुगतान करे. इसमें अख़बारों को स्वतंत्रकता भी बनी रहेगी और वे  बाजार के उतार-चढ़ाव से प्रभावित भी नहीं होंगे. दूसरे शब्दों में, प्रिंट मीडिया उद्योग को राजस्व के लिए विज्ञापनों पर अत्यधिक आत्मनिर्भरता को कम करना होगा और "उपयोगकर्ता-भुगतान " मॉडल बनाना होगा ।

खबर है कि भारतीय समाचार पत्र सोसाइटी (INS) ने अखबारी कागज पर 5 प्रतिशत सीमा शुल्क हटाने के लिए I & B मंत्रालय से अपील किया है। भारत के सभी छोटे और बड़े अखबार  लागत को कम से कम करने के लिए लागत में कटौती के कई उपाय किए जा रहे हैं।

रजिस्ट्रार (आरएनआई) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में  31 मार्च 2018 को पंजीकृत प्रकाशनों की कुल संख्या 1,18,239 थी। इसमें 17,573 समाचार पत्र और 1,00,666 पत्रिकायें शामिल थे। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में  में 900 से अधिक टेलीविजन चैनल हैं, जिनमें से लगभग आधे समाचारों के लिए समर्पित हैं।

महामारी के दौर में अफवाहें अद्भुत रूप से ताकतवर हो जाती है. समाचार पत्रों के माध्यम से फैलने वाले कोरोनोवायरस के बारे में मिथकों और व्यामोह ने महानगरों में रहने वाले उच्च माध्यम वर्ग को भयभीत कर  दिया है. अन्य  बड़े शहरों में भी कमोबेस यही हाल है. जमशेदपुर जैसे शहरों में बड़े अख़बारों के पन्ने घट कर आधे रह गए है. इसमें प्रभात खबर, हिंदुस्तान,दैनिक भास्कर और दानिक जागरण जैसे अखबार शामिल हैं.

खबर है कि दो अंग्रेजी दैनिकों - द इंडियन एक्सप्रेस और द बिजनेस स्टैंडर्ड ने भी वेतन कटौती की घोषणा की है। हिंदुस्तान टाइम्स ने अपने कर्मचारियों के वेतन घटक में परिवर्तनशील घटक को निश्चित वेतन का प्रतिशत बदलकर किया है, जो कंपनी के प्रदर्शन से जुड़ा हुआ है।

पुणे स्थित सकाल मीडिया समूह ने पिछले महीने अपने साकल टाइम्स की संपादकीय टीम के 15 कर्मचारियों को  नौकरी छोड़ने के लिए कहा। मुंबई से प्रकाशित होने वाले हिंदी अखबार हमारा महानगर ने मुंबई, पुणे और नासिक से तीन संस्करणों को बंद कर दिया है। मैसूरु से प्रकाशित 43 साल पुराने  इवनिंग मैसूर के अंग्रेजी दैनिक ‘स्टार’ ने 13 अप्रैल से प्रकाशन बंद कर दिया है।

लेकिन इसमें थोड़ी राहत की बात यह है कि छोटे शहरों में अखबारों के नियमित ग्राहकों की संख्या में ज्यादा कमी नहीं आई. किन्तु खुदरा बिकने वाले अखबार की संख्या बहुत कम हो गई.  लेकिन  वितरण में कमी नहीं होने के बाद भी विज्ञापन में  जबरदस्त कमी आई है. फलस्वरूप,  लोकल अखबार, कम पन्ने छाप कर,  लागत नियंत्रित कर रहे हैं.

Lockdown का असर  फ्री लांसर फोटोग्राफरों और स्वतंत्र पत्रकारों पर बेहद बुरा पड़ा है. कई तो भुखमरी के हालात से गुजर रहे हैं.

प्रिंट मिडिया के अलावा ऑनलाइन न्यूज़ मीडिया भी आर्थिक संकट से जूझ रहा है. नोएडा स्थित एक हिंदी समाचार चैनल द क्विंट, न्यूज नेशन नेटवर्क ने वित्तीय संकट का हवाला देते हुए पूरी अंग्रेजी डिजिटल टीम को ही बर्खास्त कर दिया है.                  

द क्विंट जैसे ही हालात कमोबेश सभी बड़े ऑनलाइन न्यूज़ चैनल्स के हैं. लॉक डाउन के दौरान जब बाजार पूरी तरह बंद था तो विज्ञापन देने का कोई उदेश्य ही नहीं बचा था. फिलहाल ऑनलाइन पाठ्यक्रमों के लिए कुछ विज्ञापन है. लेकिन  असली पैसा तो luxary उत्पादों के विज्ञापन से आता है. ग्राहक फिलहाल चावल और दाल खरीद रहा है.

Lockdown के दौरान  मासिक पत्रिकाओं का प्रकाशन  पूरी तरह बंद हो गया है. लॉकडाउन के दौरान पत्रिका वितरित करना संभव नहीं है, इसलिए प्रिंट संस्करण लाने का कोई उधेश्य नहीं बचता. दरअसल, मीडिया हाउस निकट  भविष्य को लेकर बहुत आशावादी नहीं हैं. वे निराशा में अपने लागत को कम करने के लिए कर्मचारियों की छंटनी और उनके वेतन में कटौती कर रहे हैं.

टीवी न्यूज़ मीडिया की अलग समस्या है. BARC-Nielsen की रिपोर्ट के अनुसार, हालांकि दर्शकों की संख्या में तेजी देखी गई है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप विज्ञापनों में वृद्धि नहीं हुई है। फिलहाल टीवी न्यूज़ मीडिया पर 18 प्रतिशत GST लगाया जाता है. न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन इसे कम करने की की मांग कर रहा है. इसमें एक दिलचस्प बात यह है कि डिजिटल और विडियो पोर्टल्स पर भारी ट्रैफिक दर्ज की गई है. लेकिन, ये चैनल भी पूरी तरह से विज्ञापन राजस्व पर ही निर्भर हैं.

इधर "सरकार ने अख़बार उद्योग के अनुरोध पर अखबारी कागज पर 10 प्रतिशत सीमा शुल्क घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया है। लेकिन दूसरा तथ्य यह भी है कि पिछले साल से सरकारी विज्ञापनों में भारी गिरावट आई है, विशेषकर सरकारी परियोजनाओं के उद्घाटन की घोषणा करने वाले विज्ञापनों की संख्या में में काफी कमी आई है. इसने छोटे और मध्यम स्तर के समाचार पत्रों को विशेष रूप से प्रभावित किया है, क्योंकि बड़े अखबारों में अभी भी आय के अन्य स्रोत हैं।"

न्यूज़ उद्योग की परेशानी तब तक बनी रहेगी  जब तक कि वह  विज्ञापन राजस्व पर अपनी निर्भरता को कम नहीं करेगा. "उपयोगकर्ता-भुगतान के सिद्धांत को मीडिया उद्योग के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत बनना चाहिए, अगर इसे आर्थिक मंदी से बचना है.इस परिस्थिति में यह सिधांत कि user-must-pay, को ब्रहमवाक्य बनाने की जरुरत है.



कोल्हानम (KOLHANAM) -छोटानागपुर पठार के सनातन संपर्कों को तलाशती ईसा-पूर्व 100 की महागाथा !! (ISBN: 978-93-5416-405-7) बुक रिव्यु

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